• thephytologist@gmail.com
  • India
Home
Birbal Sahni: The Great Palaeobotanist

Birbal Sahni: The Great Palaeobotanist

Birbal Sahni [बीरबल साहनी] एक महान भारतीय Palaeobotanist थे. लखनऊ स्थित Institute of Palaeobotany की स्थापना बीरबल साहनी के द्वारा की गई थी. बीरबल साहनी की मृत्यु के बाद इस संस्थान का पुनः नामकरण कर बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलेयोबॉटनी नाम दिया गया.

वह भारत में पहले भूवैज्ञानिक [Geologist] थे जिन्होंने पुरातत्व [Archaeology] में रुचि ली और पुरापाषाणकालीन अनुसंधान को आगे बढ़ाया.

According to Oxford University

‘The study of fossil plants, palaeobotany, it not only of interest in itself, but can be applied to solving a wide range of biological and geological problems.’

बीरबल साहनी की महत्वपूर्ण घटनाक्रम | Historical events of Sahni’s Life

शुरुआत के दिनों में | Early life of Birbal Sahni

सन् 14 नवंबर 1891 को बीरबल साहनी का जन्म शाहपुर जिला, पश्चिम पंजाब में हुआ. उनके पिता का नाम लाला रुचि राम साहनी और माता श्रीमती ईश्वर देवी थी. दो भाइयों में बीरबल साहनी [Birbal Sahni] छोटे थे.

पिता लाला रुचि राम साहनी पेशे से रसायन विज्ञान के प्रोफेसर थे साथ ही साथ एक देशभक्त और समाज सुधारक थे. उन्होंने तात्कालिक स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी निभाई.

सुंदर दास सूरी की बेटी सावित्री सूरी से उनकी शादी 1920 में हुई थीं. पत्नी सावित्री सूरी ने उनकी वैज्ञानिक गतिविधियों में सक्रिय रुचि ली तथा हमेशा उनके समर्थन का एक आधार बनी रहे।

शिक्षा-दीक्षा | Schooling and Education

बीरबल साहनी [Birbal Sahniके अध्ययन से जुड़ी निम्नलिखित महत्वपूर्ण जानकारी है: 

  • अपनी प्रारंभिक शिक्षा मिशन और सेंट्रल मॉडल स्कूलों से प्राप्त करने के बाद बीरबल साहनी [Birbal Sahni] लाहौर के उसी गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ने चले गए जहाँ उनके पिता प्रोफेसर थे, जहाँ से उन्होंने 1911 में स्नातक उपाधि ली.
  • वनस्पति विज्ञान के होनहार छात्र थे बीरबल साहनी [Birbal Sahni]. वनस्पति विज्ञान के प्रति गहरी रूचि और समझ जगाने में उनके एक गुरु S R Kashyap का महत्वपूर्ण योगदान था. उनके प्रेरणा के फलस्वरूप ही बीरबल उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड चले गए.
  • कैम्ब्रिज स्थित इमैनुएल कॉलेज में प्रवेश लिया. सन् 1913 में प्राकृतिक विज्ञान के ट्रिपोज़ [Tripos] भाग 1 में प्रथम श्रेणी के साथ अव्वल रहे.
  • इसी तरह सन् 1915 में ट्रिपोज़ [Tripos] के भाग 2 को भी पूरा किया उसी दौरान उन्होंने बी.एस.सी की डिग्री भी लंदन विश्वविद्यालय से प्राप्त की.
  • सर अल्बर्ट चार्ल्स सेवर्ड के शोध निर्देशन में उन्होंने पैलेयोबॉटनी पर अपना शोधकार्य शुरू किया. इसी के साथ, भारतीय गोंडवाना पौधों के अध्ययन पर काम किया.
  • अपने शोध निष्कर्षों को 1920 में ‘इंडियन गोंडवाना प्लांट्स: ए रिविजन’ [Indian Gondwana Plants: A Revision] पुस्तक में प्रकाशित किया. सन् 1919 में उन्हें लंदन विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई.

अनुसंधान कार्य | Birbal Sahni's Contribution to Palaeobotany

Birbal

  • शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात् वह जर्मनी गए जहाँ जर्मन प्लांट मॉर्फोलॉजिस्ट गोएबेल [German plant morphologist Goebel] के साथ कुछ समय तक काम किया.
  • तत्पश्चात् भारत लौट आए और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर नियुक्त किए गए.
  • 1921 में, वह लखनऊ विश्वविद्यालय के नवनिर्मित वनस्पति विज्ञान विभाग में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के रूप में अपनी मृत्यु सन् 1949 तक सेवाएं देते रहे.  
  • शोध दूरदर्शिता और शानदार नेतृत्व में वनस्पति विज्ञान विभाग शिक्षण और अनुसंधान का एक सक्रिय केंद्र बन गया. यह भारत में वनस्पति और पुरापाषाण संबंधी जांच का पहला केंद्र बन गया.
  • Geology [भूविज्ञान] के क्षेत्र में भी उनकी गहरी रुचि थी और उनका मानना ​​था कि Palaeobotany और Geology एक दूसरे से जटिल रूप से संबंधित हैं. उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग में भी विभागाध्यक्ष रहे.

पुरातत्व अध्ययन में योगदान | Contribution of Birbal Sahni to Archeology

पुरातत्व अध्ययन में भी उनके विख्यात योगदान रहे हैं. उन्होंने खोखरा-कोट से रोहतक (1936) और लुधियाना के पास सुनहेट से (1941), योध्या सिक्का मोल्ड्स [Yaudheya Coin Moulds] पर अध्ययन किया.

अपने अध्ययन में उन्होंने कहा कि पुरापाषाणवादी [Palaeobotanist] और पुरातत्वविदों [Archaeologist] के उद्देश्य और तरीके एक समान हैं क्योंकि दोनों ही अतीत की व्याख्या और पुनर्निर्माण के उद्देश्य से कार्य करती हैं.

बीरबल साहनी की महत्वाकांक्षा | Ambition’s of Birbal Sahni

  • बीरबल साहनी की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा भारत में पुरातनपंथी अनुसंधान [Palaeobotanical research] को एक संरचित और संगठित ढांचे में लाना था.
  • इस उद्देश्य के लिए, उन्होंने सन् 1939 में “द पैलेयोबॉटनीकल सोसाइटी” [The Palaeobotanical Society] नाम से भारतीय पुरापाषाणवादियों [Palaeobotanist] की समिति का गठन किया.
  • समिति का गठन के बाद भारत में अनुसंधान क्षेत्रों के समन्वय और विकास के लिए एक बैठक की भी अध्यक्षता की.
  • इसी पैलेयोबॉटनी सोसाइटी के गवर्निंग बॉडी के द्वारा आखिरकार 10 सितंबर 1946 को पैलेयोबॉटनी संस्थान [Institute of Palaeobotany] की स्थापना की गई.
  • 3 अप्रैल 1949 को भारत के पहले प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू के द्वारा संस्थान के नए भवन की आधारशिला रखी गई. हालांकि साहनी अपने सपनों के संस्थान को विकसित होते देखने के लिए जीवित नहीं थे.

Birbal Sahni Institute of Palaeobotany

जैसे कि पहले ही बताया गया है, वह Institute of Palaeobotany के संस्थापक थे जिसे बाद में उनके सम्मान में Birbal Sahni Institute of Palaeobotany  नाम दिया गया था.

यह संस्थान पादप जीवाश्म अनुसंधान के क्षेत्र में उच्च शिक्षण को बढ़ावा देता है और विभिन्न संगठनों जैसे कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, तेल और प्राकृतिक गैस आयोग, ऑयल इंडिया लिमिटेड, कोल इंडिया लिमिटेड तथा कोयला खदान योजना और डिजाइन संस्थान के साथ समन्वय में काम करता है.

महत्वपूर्ण उपलब्धियां | Achievements of Birbal Sahni

Fellow of the Royal Society of London (FRS) के द्वारा उन्हें 1936 में फेलो चुना गया, जो सर्वोच्च ब्रिटिश वैज्ञानिक सम्मान था, इस सम्मान को हासिल करने वाले वह पहले भारतीय वनस्पतिशास्त्री बने.

उन्होंने उसी वर्ष रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल का बार्कले मेडल भी प्राप्त किया.

Numismatic Society of India [न्यूमिज़माटिक सोसाइटी ऑफ इंडिया] के नेल्सन राइट मेडल से उन्हें सन् 1945 में तथा सन् 1947 में Sir C. R. Reddy National Prize [सर सी. आर. रेड्डी राष्ट्रीय पुरस्कार] से सम्मानित किया गया था.

निष्कर्ष | Conclusion

Birbal Sahni जैसे महान रिसर्चर के प्रयासों का ही नतीजा है कि हम पादप जीवाश्म अनुसंधान के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त कर चुके है और अन्य देशों के मुकाबले पादप जीवाश्म अनुसंधान के क्षेत्र में कहीं बेहतर स्थिति में है.

भारत में मौजूद विभिन्न सरकारी, निजी और गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर Birbal Sahani Institute of Palaeobotany ने Palaeobotany, Archaeology और Geology के क्षेत्र में कई महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट पर सफलतापूर्वक कार्य किया है.

Further Readings...

14 thoughts on “Birbal Sahni: The Great Palaeobotanist

Comments are closed.