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Chemical based farm inputs: Current status in India

Chemical based farm inputs: Current status in India

Chemical Fertilizer भारतीय कृषि की रीड़ मानी जाती है, वजह है तेजी से कम होती भूमि की उर्वरा शक्ति और किसानों की अधिक उत्पादन लेने की ललक.

हाल ही में भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (IFFCO) सहित भारत के अन्य उर्वरक निर्माताओं ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि के परिणामस्वरूप डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) जैसे कृषि आदानों की कीमत में भारी वृद्धि की घोषणा की.

पिछले कुछ महीनों में, पोटाश, डीएपी, फॉस्फोरिक एसिड जैसे Chemical Fertilizer की कीमतों में काफी वृद्धि हुई है, जिससे उर्वरक निर्माताओं को de-controlled पोषक तत्वों की कीमतों में वृद्धि करने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

हालांकि,  मौजूदा सरकार ने घोषणा की कि निर्माताओं को सभी उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि नहीं करने के लिए कहा गया है. इफको ने यह भी स्पष्ट किया है कि पुरानी दरों के साथ पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है जो किसानों को पुरानी दरों पर ही बेची जाएगी.

इसके अलावा, इफको ने यह भी कहा है कि नई कीमतें केवल अस्थायी हैं और अभी तक कंपनियों द्वारा इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया है.

उर्वरक के उपयोग को निर्धारित करने वाले कारक | Factors determine to usage of chemical fertilizer

उर्वरकों [FERTILIZER] और कीटनाशकों [PESTICIDES] की खपत कई कारकों द्वारा निर्धारित होती है जैसे कि भूमि का क्षेत्र, फसल का प्रकार, फसल का पैटर्न और फसल की तीव्रता, मिट्टी का प्रकार तथा उसकी स्थिति, कृषि-जलवायु की स्थिति, किसानों की खरीद की क्षमता, सिंचाई इत्यादि.

Agriculture & Co-operation and farmers Welfare विभाग रासायनिक उर्वरकों [Chemical Fertilizers] जैसे: Urea (नाइट्रोजन), DAP, MOP (म्यूरेट ऑफ़ पोटाश), और NPK (जिसमें प्रमुख पोषक तत्व होते हैं- नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम) की आवश्यकता का निर्धारण करने के लिए आकलन भी करता है.

मौसम के आधार पर उपर्युक्त कारकों को ध्यान में रखते हुए तथा राज्यों के परामर्श से प्रत्येक मौसम की आवश्यकता को अंतिम रूप देता है.

प्रत्येक फसल के मौसम की शुरुआत से पहले द्वि-वार्षिक क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं यानी खरीफ (अप्रैल से सितंबर) और रबी (अक्टूबर से मार्च). राज्यों को उर्वरकों का आवंटन इसी प्रक्रिया का परिणाम है.

यूरिया की सर्वाधिक मांग | The highest demand record for urea

भारत ने पिछले 10 वर्षों में औसतन प्रति वर्ष लगभग 500 लाख मीट्रिक टन (LMT) उर्वरक की खपत की है. सरकार ने हाल ही में राज्यसभा में वर्ष-वार खपत के आंकड़े प्रदान किए, जिसमें 2015-16 से भारत में उपयोग किए जाने वाले रासायनिक उर्वरकों की डेटा दिखाया गया है.

साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, यूरिया सबसे अधिक खपत वाला उर्वरक है, जिसमें हर साल लगभग 300 लाख मीट्रिक टन (LMT) की खपत होती है, जो देश में रासायनिक उर्वरक की खपत का 55% से 60% हिस्सा है.

2016-17 और 2019-20 के बीच, Urea, DAP और NPK की खपत में लगातार वृद्धि हुई है. 2020-21 के लिए डेटा अनंतिम है और फरवरी 2021 तक उपलब्ध है.

भले ही यह डेटा केवल फरवरी 2021 तक का है, लेकिन DAP और NPK की खपत पहले से ही 2015-16 से 2020-21 तक छह साल की अवधि में 2020-21 में सबसे अधिक दर्ज की गई.

2020-21 में खपत की गई यूरिया की अंतिम आंकड़ों पर गौर करें तो भी 2019-20 के स्तर को पार कर सकती है, जिससे 2020-21 में खपत सबसे अधिक हो जाएगी.

भारत में औसत रासायनिक उर्वरक खपत में वृद्धि | Average chemical fertilizer consumption increased in India

भारतीय राज्यों में उर्वरकों की औसत प्रति हेक्टेयर खपत (किलो/हेक्टेयर में) में पांच साल का आकड़ा भी सरकार द्वारा राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया था.

इस आंकड़े के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख रासायनिक उर्वरकों [Chemical Fertilizers] की औसत खपत 2015-16 में 135.76 किलोग्राम/हेक्टेयर थी जो 2016-17 में घटकर 123.41 किलोग्राम/हेक्टेयर हो गई.

हालाँकि, अब राष्ट्रीय स्तर पर खपत धीरे-धीरे बढ़कर 133.44 किलोग्राम/हेक्टेयर हो गई है.

सबसे अधिक और कम खपत वाला राज्य | Highest and least consuming state chemical fertilizers

बिहार (245.25 किग्रा.) उर्वरकों की प्रति हेक्टेयर खपत के मामले में 2019-20 में सूची में सबसे ऊपर रही  जबकि पुडुचेरी (244.77 किग्रा.) छोटे क्षेत्रफल होने के बावजूद दूसरे स्थान पर रही.

पंजाब, हरियाणा और तेलंगाना उन शीर्ष पांच राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल हैं, जिन्होंने 2019-20 में 200 किग्रा/हेक्टेयर से अधिक की खपत की सूचना दी है.

उपरोक्त राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने भी 2015-16 से 2019-20 तक की पांच साल की अवधि में लगातार 200 किग्रा/हेक्टेयर से अधिक की खपत की सूचना दी है।

पुडुचेरी ने 2015-16 में लगभग 406 किग्रा/हेक्टेयर उर्वरक की खपत की थी. ये पांच राज्य 2017-18 के बाद से किसी विशेष क्रम में शीर्ष पांच में शामिल हैं.

दूसरी ओर, केरल और जम्मू और कश्मीर उन प्रमुख राज्यों में से हैं, जहां उर्वरक की खपत सबसे कम है. इन दोनों राज्यों ने पांच वर्षों में उर्वरकों के औसत उपयोग में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की है.

केरल ने 2015-16 में 87 किग्रा/हेक्टेयर से 2019-20 में 36.49 किग्रा/हेक्टेयर की गिरावट दर्ज की जबकि इसी अवधि के दौरान जम्मू और कश्मीर में 105.49 किग्रा/हेक्टेयर से घटकर 40.85 किग्रा/हेक्टेयर हो गया.

महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड ऐसे प्रमुख राज्य हैं जिन्होंने इस पांच साल की अवधि के दौरान लगातार राष्ट्रीय औसत से कम उर्वरक उपयोग की सूचना दी है.

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दिल्ली उन प्रदेशों में से हैं जिन्होंने इन पांच वर्षों में औसत उर्वरक खपत में लगातार वृद्धि देखी है.

पिछले पांच वर्षों में रासायनिक कीटनाशकों की खपत की शीर्ष सूची | Top list of Chemical pesticide consumption in the last five years

लागतार भारत में रासायनिक कीटनाशकों की खपत भी बढ़ रही है. 2015-16 और 2019-20 के बीच देश में कीटनाशकों की कुल खपत में 56,720 मीट्रिक टन (MT) से 61,702 मीट्रिक टन की कुल खपत में 8.78% की वृद्धि हुई है.

महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश पिछले पांच वर्षों में देश में रासायनिक कीटनाशकों के प्रमुख उपभोक्ता हैं। महाराष्ट्र में खपत 2015-16 में 11,665 मीट्रिक टन से बढ़कर 2019-20 में 12,783 मीट्रिक टन हो गई.

इसी अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश में खपत 10,457 मीट्रिक टन से बढ़कर 12,217 मीट्रिक टन हो गई थी. कुल मिलाकर दोनों राज्यों ने राष्ट्रीय स्तर पर रिपोर्ट की गई कुल खपत का 40% हिस्सा लिया.

कीटनाशकों का सबसे कम प्रयोग छोटे राज्यों में हुआ। 2015-16 में 48 मीट्रिक टन की तुलना में 2019-20 में गोवा में सबसे कम खपत 30 मीट्रिक टन थी. पुडुचेरी में भी खपत कम थी और हर साल 40 से 43 मीट्रिक टन खपत होती थी.

मेघालय और सिक्किम के पूर्वोत्तर राज्यों को संसद में प्रदान की गई प्रतिक्रिया में ‘Organic States’ के रूप में चिह्नित किया गया.

Usage of Bio-pesticide in India | भारत में जैव कीटनाशकों का उपयोग

जैव-कीटनाशकों के मामलें में महाराष्ट्र सबसे बड़े उपभोक्ता है सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जैव कीटनाशकों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है.

2015-16 में जैव कीटनाशकों की खपत राष्ट्रीय स्तर पर 6,148 मीट्रिक टन के मुकाबले 2019-20 में 8,847 मीट्रिक टन थी. यद्यपि जैव कीटनाशकों की खपत में निरंतर वृद्धि हुई है किन्तु पारंपरिक रासायनिक कीटनाशकों की तुलना में मात्रा अभी भी बहुत कम है.

डेटा के अनुसार पिछले पांच वर्षों के दौरान महाराष्ट्र जैव कीटनाशकों का प्रमुख उपभोक्ता रहा लेकिन 2016-17 के बाद इस राज्य की खपत में गिरावट आई है.

2016-17 में महाराष्ट्र ने 1,454 मीट्रिक टन की खपत की थी, जो राष्ट्रीय स्तर पर खपत का पांचवां हिस्सा था. हालांकि, खपत 2019-20 में घटकर 1,082 मीट्रिक टन हो गई, जो कुल राष्ट्रीय खपत का 12% है.

जैव कीटनाशकों के अन्य प्रमुख उपभोक्ता पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और छत्तीसगढ़ हैं. राजस्थान ने पिछले वर्षों की तुलना में 2019-20 में जैव कीटनाशकों की खपत में लगभग 100 गुना वृद्धि दर्ज की है.

2015-16 से 2018-19 के बीच वार्षिक खपत 15 मीट्रिक टन से कम थी और 2019-20 में यह बढ़कर 929 मीट्रिक टन हो गई.

सरकार द्वारा रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को रोकने के उपाय | Measures taken by the government to stop the use of chemical fertilizers

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने कीटनाशकों के जोखिम और स्वास्थ्य प्रभावों का आकलन करने के लिए एक बहु-केंद्रित अध्ययन शुरू किया है.

यही नहीं पौध संरक्षण और पौध संगरोध पर उप-मिशन के तहत राज्य विस्तार अधिकारियों और किसानों को ‘एकीकृत कीट प्रबंधन’ पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है,

जहां अंतिम उपाय के रूप में रासायनिक कीटनाशकों का विवेकपूर्ण उपयोग, कीटनाशकों के उपयोग में सुरक्षा, वैकल्पिक कीट प्रबंधन के लिए उपकरण जैसे; कीट नियंत्रण के कल्चरल, फिजिकल और यांत्रिक तरीकों के साथ-साथ जैव-कीटनाशकों और जैव-नियंत्रण एजेंटों के उपयोग, कीटों के प्राकृतिक दुश्मनों पर कीटनाशकों के प्रभाव, उचित अनुप्रयोग उपकरण और तकनीक सहित कीटनाशक के क्या करें और क्या न करें पर प्रकाश डाला गया है.

Further Readings

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