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Is Vanaspati Ghee Good or Bad for Health?

Is Vanaspati Ghee Good or Bad for Health?

Vanaspati Ghee भारतीय रसोई में एक लोकप्रिय उत्पाद है. हम सभी इसे डालडा के नाम से जानते है. यहाँ यह बताना बहुत महत्वपूर्ण है कि डालडा एक ब्रांड है जो वनस्पति घी का उत्पादन करती है.

यह वनस्पति घी, पारंपरिक घी अर्थात दूध से बने घी का एक विकल्प है. यहाँ “वनस्पति” शब्द से तात्पर्य है कि इसे वानस्पतिक तेलों का उपयोग करके घी बनाया जाता है.

अक्सर हम सभी पारंपरिक घी के सेवन से आश्वस्त होते है, ठीक उसी तरह लोगों में अक्सर Vanaspati Ghee के स्वास्थ्य से जुड़ी कई सवाल होते है. यह स्वास्थ्यगत दृष्टिकोण से अच्छा है या नहीं जवाब जानकर आप चौंक सकते हैं.

विज्ञापनों में भ्रामक जानकारी दी जाती है जिससे लोग अक्सर अपने स्वास्थ्य के साथ अनजाने में समझौता कर बैठते है.

वनस्पति घी क्या है | What is Vanaspati Ghee?

आसान शब्दों में कहें तो पाम तेल को निकल धातुयुक्त [Nickel element] उत्प्रेरक के साथ पूर्ण या आंशिक रूप से हाइड्रोजनीकृत करके Vanaspati Ghee तैयार किया जाता है. यह पूरी प्रक्रिया बड़े रिएक्टरों में कम से मध्यम दबाव (3-10 Bar) में कराया जाता है.

पूरी प्रक्रिया में निकल धातु का प्रयोग किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकती है इसलिए तैयार उत्पाद में निकल धातु की अनुपस्थिति सुनिश्चित की जाती है. यदि इसकी मात्रा पाई भी गई तो भारतीय मानक के अनुसार यह 1.5 मि.ग्रा./कि.ग्रा. से अधिक नहीं होना चाहिए.

आजकर Vanaspati Ghee बनाने के लिए पाम तेल के साथ ही साथ सोयाबीन, सरसों और कपास के तेल का भी सबसे अधिक उपयोग किया जाता है.

पाम तेल क्या है | What is Palm oil

पाम जिसे ताड़ भी कहा जाता है, इसके फलों से तेल प्राप्त किया जाता है उसे ही पाम आयल कहा जाता है. वनस्पति घी बनाने के अलावा इसके कई अन्य औद्योगिक उपयोग होते है.

भारत में वनस्पति घी का इतिहास | History of Vanaspati ghee in India

सन् 1930 की शुरुआत में भारत के शहरी क्षेत्रों के विस्तार के साथ जनसंख्या में भी वृद्धि होने लगी, इस कारण उचित मात्रा में घी आपूर्ति असंभव हो गया. घी की इस कमी को पूरा करने के लिए विकल्प के तौर पर Vanaspati Ghee का उपयोग किया गया.

इस प्रकार, हॉलैंड से आंशिक रूप से हाइड्रोजनीकृत वनस्पति तेल (PHVO) की तकनीक का आयात करके भारत में वनस्पति घी की कहानी शुरू हुई. डच व्यापारी भारत में हाइड्रोजनीकृत वनस्पति वसा लाते थे, जो भारतीय बाजार में सफल उत्पाद साबित हुई.

वर्ष 1930 में, हिंदुस्तान वनस्पति मैन्युफैक्चरिंग कंपनी को इसके उत्पादन और बिक्री के लिए स्थापित किया गया जो वर्तमान में हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड के नाम से जाना जाता है.

‘डालडा’ नाम डच वंश से सम्बंधित है. दरअसल उन दिनों, इसे डच कंपनी, दादा एंड कंपनी द्वारा आयात किया गया था और जब ब्रांड स्थापित किया गया तो हिंदुस्तान यूनिलीवर से ‘L’ को इस नाम के बीच में शामिल करके वे इस विरासत को प्रतिबिंबित किया गया.

समय के साथ, Dalda ने इतनी लोकप्रियता और उपयोग प्राप्त किया, कि यह नाम वानस्पति घी का पर्याय बन गया.

वनस्पति घी की विशेषता | Characteristic of Vanaspati Ghee

वनस्पति घी का रंग सफेद से बहुत हल्का पीला रंग का होता है. इसका गलनांक लगभग 34 डिग्री सेल्सियस है. सामान्य घी की तरह दानेदार संरचना में क्रिस्टलीकृत करने के लिए इसे रेफ्रिजरेटर में ठंडा किया जाता है.

भारतीय बाजारों में वनस्पति घी के लगभग सभी ब्रांड ज्यादातर पाम तेल से निर्मित होते हैं जो पूर्ण या आंशिक रूप से हाइड्रोजनीकृत होते हैं. पाम के फल में कैरोटीन पिगमेंट की उच्च मात्रा पाई जाती है जिसके कारण इसका तेल चमकीले नारंगी रंग का होता है.

इसमें में Trans Fats बहुत अधिक होती है, जो सामान्यत: 5-30% तथा अधिकतम 50% तक हो सकता है. दरअसल ट्रांस फैटी एसिड असंतृप्त फैटी एसिड होता है. जब कभी असंतृप्त तेल को हाइड्रोजनीकरण नामक प्रक्रिया से गुजरा जाता है तो अर्द्ध ठोस रूप में परिवर्तित हो जाता हैं.

पौधों या वनस्पति आधारित Trans Fats खराब फैट की श्रेणी में आते हैं इसका मुख्य कारण है कि यह शरीर में एलडीएल या खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं. भारतीय मिठाइयाँ, आइसक्रीम और स्नैक्स वनस्पति घी से बने होते है. इनमें ट्रांस फैट की मात्रा अधिक होती हैं.

एक रिसर्च के अनुसार भारतीय मिठाइयों में ट्रांस फैटी एसिड की मात्रा 0.3-17.7% तक पाई जाती है वहीँ भारतीय स्नैक्स में इसकी मात्रा 0.1-19% से तक हो सकती है.

भारत सहित कई दक्षिण एशियाई देशों के अधिकांश खाद्य पदार्थों में वनस्पति, हाइड्रोजनीकृत वसा का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है

उत्पादन पर नजर डाले तो भारत में ही प्रतिवर्ष लगभग 1.1 मिलियन मीट्रिक टन वनस्पति घी का उत्पादन किया जा रहा है, जिसे बड़ी मात्रा में कन्फेक्शनरी, बेकरी और कई खाद्य पदार्थ में उपयोग किया जा रहा है.


Vanaspati ghee
Image From: freshtm.com

वनस्पति तेल एवं वनस्पती घी में अंतर | Difference between Vanaspati ghee and Vegetable oil

हाइड्रोजनीकरण की प्रक्रिया से वनस्पति तेलों से कृत्रिम रूप से वनस्पति घी का निर्माण किया जाता है. वनस्पति घी में वनस्पति तेलों के विपरीत अधिक संतृप्त फैटी एसिड होते हैं जिसके परिणामस्वरूप यह कमरे के सामान्य तापमान पर भी ठोस हो जाता है.

तेल की तुलना में Vanaspati ghee का शेल्फ लाइफ ज्यादा होता है साथ ही Vanaspati ghee को कई बार गर्म किया जा सकता है और आसानी से बासीपन नहीं होता है.

स्वास्थ्यगत समस्याऎं | Health Issues

कोलेस्ट्रॉल स्तर का बढ़ना | High Cholesterol Level due to Vanaspati Ghee

किसी भी माध्यम से इस तरह के घी का नियमित रूप से सेवन करने वाले लोगों में उच्च कोलेस्ट्रॉल या तेजी से कोलेस्ट्रॉल स्तर बढ़ने की समस्या हो सकती है.

मोटापे की संभावना | More Chances of Obesity

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, हाइड्रोजनीकृत तेलों में ट्रांस फैट की मात्रा कोलेस्ट्रॉल को उच्च स्तर तक पहुंचा देता है, जिससे कारण मोटापा बढ़ता है.

यह भी एक कारण है कि अक्सर लोग सस्ते रेस्तरां में भोजन करना शुरू कर देते हैं जहाँ तेल और घी के जगह सस्ते विकल्पों का उपयोग करते हैं. भारत में कुछ ही अच्छे रेस्तरां हैं जो पारंपरिक या देसी घी का उपयोग अपनी व्यंजनों में करते हैं.

डालडा में बने खाद्य पदार्थों का सेवन करने से बेली वसा [bally fat] की मात्रा बढ़ जाती है.

हृदय रोग और उच्च रक्तचाप | Heart Diseases and Hypertension

पारंपरिक घी में कम फैटी एसिड होते हैं जिसे हमारा पाचनतंत्र आसानी से पचा सकता है. इसके विपरीत Vanaspati Ghee को पचाना काफी मुश्किल होता है. यह उच्च घनत्व वाले लिपिड (एचडीएल) अर्थात अच्छा कोलेस्ट्रॉल के स्तर को भी कम करता है.

कुलमिलाकर यह सम्पूर्ण कोलेस्ट्रॉल स्तर को बढ़ाता है, जो हृदय के कार्यप्रणाली को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है. इसीलिए Vanaspati Ghee के सेवन से दिल की बीमारी या उच्च रक्तचाप का खतरा बढ़ जाता है.

टाइप 2 डायबिटीज | Type 2 Diabetes

डालडा में पाए जाने वाले वसा का सेवन करने वाले लोगों के शरीर में इंसुलिन प्रतिरोध पैदा करते हैं. इस प्रतिरोध से टाइप 2 प्रकार का मधुमेह होने का खतरा होता है.

टाइप 1 डायबिटीज के विपरीत, टाइप 2 उन जीवनशैली विकारों के अंतर्गत आता है जिसमें लोग अपने आहार की आदतों तथा व्यवहार के कारण करते हैं.

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